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Friday, 14 February 2014

केजरीवाल की सियासी 'शहादत', एक तीर से कई निशाने

दिलबर गोठी, नई दिल्ली
जन लोकपाल बिल को पेश न कर पाने के कारण अरविंद केजरीवाल 'शहीद' हो गए। उनके सामने दो विकल्प थे- सड़क पर उतरने के लिए विधानसभा में 'शहीद' हो जाएं या फिर विधानसभा में बने रहकर वह जनता से किए गए अपने वादे को पूरा न करने का जोखिम लें। उन्होंने पहला विकल्प चुना।

केजरीवाल ने पहले से ही घोषणा कर दी थी कि अगर वह अपना जन लोकपाल बिल पास नहीं करा पाए, तो इस्तीफा दे देंगे। अब नैतिकता का तकाजा यही था कि वह इस्तीफा दे ही दें। अगर इस मुकाम पर आकर वह इस्तीफा नहीं देते तो जनता में उनकी साख गिरती और किरकिरी होती। इसीलिए वह बार-बार सीएम की कुर्सी कुर्बान करने की बात कह रहे थे। उनकी विश्वसनीयता इसी में थी कि वह कुर्सी कुर्बान कर दें और आखिर उन्होंने यही किया भी।

केजरीवाल ने 49 दिन सरकार चलाई, लेकिन पहले ही दिन से वह जिस जल्दी में थे, उसे देखकर उन्हें अहसास था कि कभी भी इस्तीफा देना पड़ सकता है। इसीलिए उन्होंने बिजली-पानी सस्ता करने, बिजली कंपनियों का ऑडिट कराने और आंदोलन में साथ देने वालों का बिजली बिल माफ कराने के निर्णय बड़ी ही जल्दी में ले लिए। हालांकि, उन्होंने घोषणा की थी कि जन लोकपाल बिल पास नहीं हुआ तो इस्तीफा दे देंगे, लेकिन शुक्रवार को विधानसभा में जब यह तय हो गया कि बिल पेश नहीं हो पा रहा तो भी उन्होंने विधानसभा की कार्यवाही को आगे चलने दिया और तुरंत इस्तीफे की घोषणा नहीं की। इसका कारण यह था कि बिजली सस्ती करने के बाद बजट में प्रावधान करने का प्रस्ताव उसके बाद ही पेश होना था। उसके बिना 400 यूनिट तक इस्तेमाल करने वालों को बिजली सस्ती नहीं मिल पाती।
केजरीवाल ने अपने 49 दिनों की सरकार के दौरान टाइमिंग का सबसे ज्यादा ध्यान रखा। उन्हें पता था कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही बिल पेश नहीं होने देंगे तो उनकी 'मिलीभगत' का राज खोलने के लिए उन्होंने दो दिन पहले ही मुकेश अंबानी और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। यही वजह है कि जब दोनों ने बिल पेश नहीं होने दिया तो वह अपने आरोप को साबित करने में पीछे नहीं हटे कि अंबानी के खिलाफ एफआईआर कराने के हमारे फैसले के खिलाफ ही दोनों पार्टियां इकट्ठी हो गई हैं।

कांग्रेस ने जब केजरीवाल सरकार को समर्थन दिया था, तभी यह साबित हो गया था कि यह सरकार ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है। यह बात कांग्रेस भी कह चुकी थी कि समर्थन देने का मतलब केजरीवाल सरकार को फंसाना है और 'आप' के नेता भी यह मान रहे थे कि कब सरकार गिर जाए, कुछ पता नहीं। कांग्रेस ने इसलिए समर्थन दिया कि उसे विश्वास था कि यह सरकार उन वादों को पूरा नहीं कर सकती जो उसने सत्ता में आने के लिए जनता से किए हैं, जबकि 'आप' कांग्रेस को ही फंसाने की कोशिश में लगी हुई थी। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित समेत कांग्रेस के किसी बड़े नेता को वह सीधे तो कटघरे में खड़ा नहीं कर सकी, लेकिन उसने यह जताने की कोशिश अवश्य की कि वह जनता के हित में काम करना चाहती है।

केजरीवाल दोबारा जनता में जाने के लिए किसी ऐसे मुद्दे की तलाश में थे, जिससे यह माना जाए कि वह 'शहीद' हो गए हैं और जन लोकपाल से बड़ा मुद्दा कोई नहीं हो सकता था। इसीलिए वह इसी मुद्दे को आगे लेकर आ गए, ताकि दोबारा जनता के बीच जाकर यह कह सकें कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने मिलकर उनकी सरकार नहीं चलने दी। वह चाहते तो जन लोकपाल बिल को केंद्र के पास मंजूरी के लिए भेज सकते थे और बाद में यह कह सकते थे कि मैंने तो अपना काम कर दिया, केंद्र ही नहीं चाहता कि दिल्ली में जन लोकपाल बिल पास हो सके। मगर, वह इसी मुद्दे पर टकराव कर बैठे, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि इससे जनता में उनके लिए सहानुभूति पैदा होगी और वह 'शहीद' जैसी स्थिति में आ जाएंगे। इसीलिए केवल 49 दिन बाद ही उन्होंने अपनी सरकार की शहादत को मंजूर कर लिया।

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